Saturday 22 April 2017

कश्मीर मुद्दे पर कविता हिंदी में

(एक माँ कश्मीर मे पिटने वाले फौजी बेटे से)
फोन किया माँ ने बेटे को........तूने नाक कटाई है,
तेरी बहना से सब कहते .........बुजदिल तेरा भाई है!
ऐसी भी क्या मजबुरी थी........ऐसी क्या लाचारी थी,
कुछ कुत्तो की टोली कैसे........तुम शेरो पर भारी थी!
वीर शिवा के वंशज थे तुम......चाट क्यु ऐसे धुल गए,
हाथो मे हथियार तो थे.......क्यु उन्हें चलाना भूल गये!
गीदड़ बेटा पैदा कर के............मैने कोख लजाई है,
तेरी बहना से सब कहते .........बुजदिल तेरा भाई है!!
(लाचार फौजी अपनी माँ से)
इतना भी कमजोर नही था.......माँ मेरी मजबुरी थी,
उपर से फरमान यही था.......चुप्पी बहुत जरूरी थी!
सरकारे ही पिटवाती है..........हमको इन गद्दारो से,
गोली का आदेश नही है.......दिल्ली के दरबारो से!
गिन-गिनकर मैं बदले लूँगा.....कसम ये मैंने खाई है,
तू गुड़िया से कह देना .... ना बुजदिल तेरा भाई है!

Hindi Love sad shayari

 बर्बादियों के बेहिसाब किस्से सुने हैं मैंने 
जिनसे कभी सुना था ,मुहब्बत बड़ा सुकून देती है ।।

Tuesday 21 March 2017

पिया तुम बिन सावन मै क्या करूँ?

                                                 
घिर के जो आये कारी बदरिया
मन मे दु:ख के उठे लहरिया
पिया तुम बिन सावन का क्या करूँ
ऐसे भीगे रूत में कैसे धीर धरूँ

ठंडी हवाएं मेरा जिया तरसाए
बार बार अँखियाँ भर आये
बरसे बुंद जब तन को भिगाये
बिरह की अग्नि मे मै जल मरूँ
पिया तुम बिन सावन का क्या करूँ....

रूठे तुम जब से रुठे सुख सारे
तुम ही रहे पिया जब ना हमारे
हम आस भी हारे विश्वास भी हारे
मिले, तेरे मन मे सारे दु:ख मै भरूँ
पिया तुम बिन सावन का क्या करूँ......

सुन सजना जो तु लौट के आये
तरसा जीवन थोडा सुख पाये
बहुत हुआ ना अब सहा जाये
कहीं बिरह जान ना ले जाये, डरूँ
पिया तुम बिन सावन का क्या करूँ

.... कि लोकतंत्र के डंके पे, मारो ऐसी चोट । poem on up election, poem on Yogi adityanath, hindi kavita on up chunav

कैसे बीतेंगे आने वाले पाँच बरस,
यह तय करेगा आपका एक वोट,
फिर ना कोई सोए भूखा,
....... कि लोकतंत्र के डंके पे, मारो ऐसी चोट ।

अब ना हो ऐसे चीर हरण,
ना शीश कटें जवानों के,
हर खेत में लहके धानी चुनर,...
ना लटके धड़ किसानों के ।
....... कि लोकतंत्र के डंके पे, मारो ऐसी चोट ।   

Monday 20 March 2017

तीन तलाक | kavita on teen talak | hindi kavita on teen talak

तीन तलाक

मेरे इस्कूल जाते वक्त
तीन तीन घंटे, तेरा मेरे दिदार का तकल्लुफ
दिखते ही मेरे,
तेरे चेहरे पर रंगत आ जाना
मेरे बुर्कानशीं होकर आने पर
वो तेरी मुस्कान का बेवा हो जाना
मेरे इस्कूल ना जाने कि सूरते हाल में
तेरा गली में साइकिल की घंटियां बजाना सुनकर
खो गई थी मैं,
और तेरी जुस्तजू में
दे दिया था मैंने मेरे अपनों की यादों को तलाक
कबूल है, कबूल है, कबूल है......

वो जादुई तीन शब्द
और
तेरा करके मूझे घूंघट से बेपर्दा,
करना मुझसे पलकें उठाने की गुजारिश
वो मुखङा दिखाने की आरजू-ओ-मिन्नत
लेटकर मेरी गोद में
मेरे झुमके को नजाकत से छुना
याद है मुझे, तेरा मेरे कंगन ओ चुङियों से खेलना
और तेरी मोहब्बत में
दे दिया था मैंने अपने खुद के वजूद को तलाक
तेरे मेरे आकाश में
तीन तीन सितारों का उगना
तेरे ना होने पर इनका तेरी खातिर मासूम इंतजार
और तेरे आने पर
अपनी अम्मी के पीछे छुप जाना
हल्की सी बुखार की तपन पर तेरा रात रात जागना
और
तपन का तेरी आंखों की लाली बन उतरना
तेरा इन सोते हुए फूलों को चूमना
और तेरे इतने रूहानी खयालात में
दे दिया था मैंने अपनी हर फिक्र को तलाक
श्वेत धवल जिंदगी में
तूने मेरे और मैंने तेरे, भर दिये थे तीनों रंग
लालीमय सुबह, सुनहरा दिन और केसरिया शाम
कितना गुलनशीं था सबकुछ
फूल पुरजोर महकते थे,
बय़ार पुरशूकन गाती थी,
सितारों कि वो टिमटिम अठखेलियां
और
मेरा हाथ थामें तूं मेरा पूरा जहां
और तेरे हंसी आगोश में
दे दिया था मैंने अपने हर रंजो-गम को तलाक
पर तीन रंगों से समयचक्र पूरा तो नहीं होता
तो मैं कैसे पूरी हो जाती
तलाक... तलाक... तलाक... तीन तलाक....

फिर ये तीन शब्द भी आये इक रोज
रात की काली रंगत से मेरा परिचय कराने
क्योंकि तूं मर्द था
और तूझ पर मौजूं थे चार निकाह
और, मैंने कर दिया था इन्कार
बांटने को मेरे तीन रंगों को किसी और के साथ
और तेरी जवानी की झाल में
दे दिया तूंने मेरी हसरतों को तीन तलाक
तीन शब्दों में तूने, तार तार कर डाला,
हर रूहानी रिश्ता, हर रूहानी याद, हर रूहानी वादा
बङा याद आता है....... तूं हर वक्त.....

रो पङते हैं बच्चे रातों को अक्सर
और मैं अकेली इन्हें चुप भी नहीं करा पाती
तेरे बिन सुबहो अब चूभती है मूझे
क्या करूं, कैसे करूं, कहां जाऊं, कहां मरूं
आजा इक आखिरी बार, देख तो जा
कि तूंने बस यूं ही बोल कर तीन तलाक
किस तरह से किया है,
इक खिलखिलाते ताजमहल को खाक
माना अब फूल मेरे जीवन में ना महकेंगें,
माना अब पुरवा मेरे लिए ना गाएगी,
अब सितारे मेरी हसरतों को पूरा करने को ना टूटेंगें
पर फिर भी
खुदा से ये दुआ है मेरी
कि, रखे वो तुझे मेरी बद्दुआओं से महफूज
परवरदिगार बख्शे तूझ तक पहुंचने से
मेरे बच्चों के आंसुओं की आग
तेरी खातिर अब से पहले भी
मैंने खुद को दिये हैं बहुत से तलाक
जा मैं भी करती हूं आजाद तूझे
तलाक... तलाक... तलाक... तीन तलाक....
आज तक की सबसे बेहतरीन गजल...

रुख़सत हुआ तो आँख मिलाकर नहीं गया,
वो क्यूँ गया है ये भी बताकर नहीं गया।

यूँ लग रहा है जैसे अभी लौट आएगा,
जाते हुए चिराग़ बुझाकर नहीं गया।

बस, इक लकीर खेंच गया दरमियान में,
दीवार रास्ते में बनाकर नहीं गया।

शायद वो मिल ही जाए मगर जुस्तजू है शर्त,
वो अपने नक़्श-ए-पा तो मिटाकर नहीं गया।

घर में हैं आज तक वही ख़ुशबू बसी हुई,
लगता है यूँ कि जैसे वो आकर नहीं गया।

रहने दिया न उसने किसी काम का मुझे,
और ख़ाक में भी मुझको मिलाकर नहीं गया।

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 निगाहो में अभी तक दूसरा कोई चेहरा ही नहीं आया,
भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का..
                     
फरियाद कर रही है तरसती  हुई निगाहें,
देखे हुए किसी को बहुत दिन गुज़र गए..        

             
 फांसले अक्सर मोहब्बत ने बढ़ा लिए है,
पर ऐसा नहीं की मैंने मिलना छोड़ दिया...                      


 फांसला रख के क्या हासिल कर लिया तुमने,
रहते तो आज भी तुम मेरे दिल में ही हो..